Saturday, February 14, 2015

गोटू और मोटू


- मीनाक्षी मिश्रा



गोटू और मोटू जोकर डंबो सर्कस में काम करते थे। वे दोनों अच्छे मित्र थे। गोटू बहुत लंबा और पतला था, जबकि मोटू छोटा व मोटा था।

एक दिन गोटू और मोटू सर्कस में करतब दिखा रहे थे। गोटू हवा में साबुन के बुलबुलों को पकड़ने की कोशिश कर रहा था। यह देख कर बच्चे हँसते हुए तालियाँ बजाने लगे।

उसी समय अचानक गोटू ने थोड़ासा साबुन वाला पानी जमीन पर उड़ेल दिया। फिर जैसे ही मोटू बुलबुले को पकड़ने के लिए ऊपर की ओर कूदा, फिसल कर नीचे गिर गया।

मोटू दर्द के कारण जोरजोर से चिल्लाने लगा, "हाय, मैं मर गया।"

गोटू और सर्कस देखने वाले बच्चों ने सोचा कि यह उसका दूसरा करतब है। इसलिए वे जोर जोर से हँसने लगे।

लेकिन मोटू को बहुत चोट आई थी। वह इस कारण भी दुखी था कि गोटू उस पर हँस रहा है। तभी उसने गोटू को सबक सिखाने का निश्चय किया।

'शो' के बाद उस रात जैसे ही सब लोग रात के खाने के लिए इकठ्ठे हुए, मोटू के दिमाग में एक विचार आया। उसने गोटू की प्लेट से २ पूड़ियाँ चुरा कर अपनी जेब में रख लीं। लेकिन गोटू को इस बात का पता न चला।

अगले दिन जब गोटू चमकीले लाल कपड़ों में शो के लिए तैयार हो रहा था, तभी मोटू ने उस की कमीज के पीछे पूडियों को लटका दिया। फिर उसने गोटू से कहा, "जल्दी करो, शो के लिए तुम्हें देर हो रही है।"

गोटू जल्दी से अपनी कैप पहन कर तंबू से बाहर आया तो ३-४ कुत्तों ने उसके पीछे चलना शुरू कर दिया। गोटू हड़बड़ाता हुआ शो के लिए चल दिया। साथ ही कुत्ते भी भौंकते हुए उसके पीछे-पीछे चलने लगे। मोटू कोने में खड़ा हँस रहा था। तभी सर्कस मैनेजर ने उन दोनों को आवाज दी, "गोटू मोटू तुम जल्दी से रिंग में जाओ।"

गोटू ने सर्कस कर्मचारियों की सहायता से कुत्तों से पीछा छुड़ाया और रिंग में पहुँचा। जब बच्चों ने गोटू की कमीज पर पूड़ियाँ लटकी देखीं तो उन्होंने सोचा कि यह भी उस के करतब का ही अगला भाग है। फिर एक पालतू कुत्ते ने पूड़ियों को सूँघ कर गुर्राना शुरू कर दिया।

लेकिन गोटू ने अपना खेल जारी रखा। उसने हवा में बुलबुले उड़ाने का करतब शुरू किया। मोटू बुलबुलों को पकड़ने के लिए कूदने लगा। तभी एकलंबा सा बुलबुला गोटू की कैप पर जा कर बैठ गया।

अब मोटू उछलने के बाद भी उसे नहीं पकड़ सका, क्योंकि उसका कद छोटा था। वह बुलबुले को पकड़ने के लिए नई योजना बनाने लगा। बच्चे उस दृश्य को देख कर बहुत खुश हो रहे थे। बाद में मोटू एक सीढ़ी लेकर आया और उसे गोटू के सामने लगा दिया। जब वह सीढ़ी पर चढ़ रहा था, तब एक दूसरा पालतू कुत्ता भीड़ में से बाहर आया और गोटू की कमीज पर लगी पूड़ियों पर झपटा। उसने गोटू को भी काट लिया।

गोटू दर्द के मारे अपना संतुलन खो बैठा। गोटू, मोटू और कुत्ता सभी धड़ाम से गिर पड़े। अब दोनों जोकर दर्द के मारे चिल्ला रहे थे, जबकि बच्चे यह देख कर हँसने लगे।

फिर गोटू और मोटू जल्दी से रिंग से बाहर आए। दोनों को अस्पताल ले जाया गया।

मोटू ने गोटू से माफी माँगी और कहा, "मैं नहीं जानता था कि मेरा यह मजाक हमें इस परेशानी में डाल देगा।" अब मोटू और गोटू ने निश्चय किया कि वे फिर ऐसी शरारत कभी नहीं करेंगे।

तभी पीछे से आवाज आई, "नहीं नहीं, ऐसा मत कहो। आज तुम दोनों की वजह से सर्कस का यह करतब बहुत कामयाब रहा है," सर्कस का मालिक मोटू और गोटू के लिए गुलदस्ता लिए खड़ा था।

गोटू व मोटू की आँखें खुशी के कारण चमकने लगीं।
१ जुलाई २००२
  

गोपी लौट आया


- दर्शन सिंह आशट



जब स्कूल से घर आकर गोपी ने अपना बैग फर्श पर फेंका तो उस में से कुछ फटी हुई कापियाँ और पुस्तकें बाहर निकल कर बिखर गई।

उसकी माताजी, जो पहले ही किसी कारण निराश-सी बैठी थीं, ने जब यह देखा तो उनका पारा चढ़ गया। उन्होंने एकदम उसके गाल पर थप्पड़ जड़ दिया और बोली, 'मॉडल स्कूल में पढते हो। वहाँ यही सब सिखाते हैं क्या? कितने दिन से देख रही हूँ। कभी बैग फेंक देते हो, कभी मोज़े और जूते निकालकर इधरउधर मारते हो। सुबह से शाम तक जी तोड़ कर काम करती हूँ। फिर कहीं जाकर मुश्किल से हजार रूपया महीना मिलता है। पता है, कैसे पढ़ा रही हूँ तुझे? देखो तो सही, क्या हालत बनाई हुई कॉपी-किताबों की। शर्म नहीं आती क्या?'

गोपी की ऐसी आदतों से उसकी माताजी बहुत परेशान थीं। गोपी के पिताजी की एक हादसे में मृत्यु हो गई थी। घर का गुजारा बड़ी मुश्किल से चल रहा था। उसकी माताजी को यह चिंता भी रहती थी कि गोपी पढ़ाई में कोई दिलचस्पी नहीं लेता।

उधर गोपी को अपनी माँ पर गुस्सा आ रहा था। पलंग पर पड़ा वह रोता रहा। कुछ सोच रहा था। अचानक उसके दिमाग में एक विचार कौंधा, 'क्यों न मैं पास वाले शहर में अपने दोस्त हैपी के पास चला जाऊँ। माताजी ढूँढेंगी तो परेशान तो होंगी।'

बस, फिर क्या था। वह माँ के घर से निकलने का इंतजार करने लगा और जैसे ही वे पड़ोस में किसी काम से गई, वह चुपके से घर से बाहर निकल लिया और बड़-बड़े कदम भरता हुआ चलने लगा। चलने से पहले उसने माँ के पर्स से बीस रूपये का एक नोट भी निकाल लिया।

कुछ देर बाद गोपी की माताजी घर आ गई। जब उन्हें गोपी कहीं नजर नहीं आया तो वे उसे ढंूढने लगीं। फिर उन्होंने सोचा कि वह अपने किसी दोस्त के पास गया होगा, थोड़ी देर में आ जाएगा।

धीरे-धीरे अँधेरा घिरने लगा और रात हो गई। गोपी अभी तक नहीं लौटा था। उसकी माँ की चिंता बढ़ने लगी। वह इस बात से बिलकुल बेखबर थीं कि वह कभी दौड़ता, तो कभी किसी साइकिल या स्कूटर से लिफ्ट लेता हुआ दूसरे शहर पहुँच गया होगा। वह अपने दोस्त हैपी का घर तो जानता ही था। हैपी के माता-पिता को इस शहर में आए दो साल से ज्यादा समय हो गया था। हैपी के पिताजी की इस शहर में बदली हो गई थी। इसलिये वह गोपी का स्कूल छोड़ कर चला गया था।

गोपी अभी हैपी के घर वाली गली में दाखिल हुआ कि उसने देखा, एक लड़का खंभे की ट्यूब की रोशनी में पढ़ने में व्यस्त था। वह उसके पास गया और उसे एकटक देखता रहा। फिर उसने पूछा, 'क्या कर रहे हो भाई?'

उस लड़के ने नजर उठाई और बोला, 'पढ़ रहा हूँ।' यह कहकर वह फिर पढ़ने लगा। गोपी के दूसरे प्रश्न ने उसका ध्यान भंग कर दिया। गोपी का सवाल था,
'कौन सी कक्षा में पढ़ते हो?'
'दसवी कक्षा में।' उत्तर मिला।
'कौन से स्कूल में?' गोपी की उत्सुकता बढ़ती ही जा रही थी।
'स्कूल में नहीं प्राइवेट ।'

वह लड़का कुछ और पढ़ना चाहता था, लेकिन गोपी के सवालों ने उसका मन उचाट कर दिया। वह अपनी पुस्तकें समेटने लगा। उसका हर रोज रात को साढ़े दस बजे तक पढ़ने का नियम था।

बातों-बातों में गोपी को यह पता चल गया कि उस लड़के के माता-पिता नहीं हैं और वह साइकिल की एक दुकान पर मरम्मत का काम करता है।

गोपी ने उससे और भी कई बातें कीं। इतने मेहनती लड़के की बातें सुनकर गोपी सन्न रह गया। उसे यह भी पता चला कि वह हर साल आधे मूल्य पर पुरानी किताबें खरीदकर पढ़ता है। गोपी ने उसकी पुस्तके देखीं तो मन ही मन उसे शर्म आई। वह सोचने लगा, उसकी माँ तो उसे नई किताबें खरीदकर देती हैं और वह उनका ऐसा हाल बना लेता है जैसे वे दो-तीन साल पुरानी हों।

गोपी के मन को एकदम झटका-सा लगा। अपनी पुस्तकों और शिक्षा के प्रति ऐसा स्नेह? इतनी मेहनत? उसे अपने से ग्लानि-सी होने लगी। वह उस लड़के को दूर तक जाते हुए देखता रहा। फिर वह सोचने लगा, उसने जो कुछ भी किया, अच्छा नहीं किया। उसने फैसला किया कि वह माँ को सारी असलियत बता देगा और माफी माँग लेगा। अब वह अपनी किताबें भी संभाल कर रखेगा। उसकी कोई भी चीज इधर-उधर नहीं बिखरेगी।

गोपी काफी देर तक यही सब सोचता रहा। हालांकि एकबारगी उसका मन हुआ भी कि वह सामने दिख रहे हैपी के घर की घंटी बजा दे, लेकिन न जाने क्या सोच कर उसने ऐसा नहीं किया।

अब उसके कदम तेजी से पीछे की तरफ लौट रहे थे अपने घर की तरफ। 

गल्लू सियार का लालच


गौरव गुप्ता की कहानी


मल्लू और गल्लू सियार भाई-भाई थे। मल्लू सीधा-सादा और भोला था। वह बड़ा ही नेकदिल और दयावान था। दूसरी ओर गल्लू एक नम्बर का धूर्त और चालबाज सियार था। वह किसी भी भोले-भाले जानवर को अपनी चालाकी से बहलाकर उसका काम तमाम कर देता था।

एक दिन गल्लू सियार जंगल में घूम रहा था कि उसे रास्ते में एक चादर मिली। जाड़े के दिन नज़दीक थे इसीलिए उसने चादर को उठाकर रख लिया। उसके बाद वह घर की ओर चल दिया।

अगले दिन गल्लू सियार मल्लू के घर गया। ठण्ड की वजह से दरवाजा खोला लेकिन जैसे ही गल्लू अन्दर जाने लगा, तो मल्लू ने दरवाजा बन्द कर लिया। गल्लू को अपने भाई की यह हरकत बहुत बुरी लगी। उसे अपने भाई पर बड़ा क्रोध आया।

भाई के घर से आने के बाद गल्लू नहाने के लिए नदी पर गया। उसको देखकर बड़ा आश्चर्य हो रहा था कि आज सारे मोटे-मोटे जानवर बड़े बेफिक्र होकर बिना किसी डर के उसके पास से गुजर रहे थे। उसके पानी में घुसने से पहले जैसे ही चादर को उतारा, उसके आश्चर्य का ठिकाना न रहा। सारे छोटे-मोटे जानवर अपनी-अपनी जान बचाने के लिए इधर-उधर भागने लगे। चारों ओर हाहाकार मच गया। गल्लू को लगा कि जरूर इस चादर का चमत्कार है। उसके मन में विचार आया कि कहीं यह जादुई तो नहीं। जिसको ओढ़ते ही वह अदृश्य हो जाता हो। तभी उसे याद आया कि मल्लू ने भी दरवाजा खटखटाने की आवाज सुनकर दरवाजा खोला और एकाएक बन्द भी कर लिया, मानो दरवाजे पर कोई हो ही नहीं।

अब उसका शक यकीन में बदल गया और उसे मल्लू पर किसी तरह का क्रोध भी नहीं रहा। वह नहाकर जल्दी से जल्दी अपने भाई मल्लू सियार के पास पहुँचना चाहता था। अत: लम्बे डग भरता हुआ उसके घर जा पहुँचा। उसने मल्लू को वह चादर दिखाई और प्रसन्न होते हुए बोला --

"देखो भाई, इस जादुई चादर को ओढ़ते ही ओढ़ने वाला अदृश्य हो जाता है। मैंने सोच है कि क्यों न इसकी मदद से मैं जंगल के राजा को मारकर खुद जंगल का राजा बन जाऊँ। अगर तुम मेरा साथ दोगे तो मैं तुम्हें महामंत्री का पद दूंगा।

"भाई गल्लू, मुझे महामंत्री पद का कोई लालच नहीं। यदि तुम मुझे राजा भी बना दोगे तो भी मैं नहीं बनूँगा क्योंकि अपने स्वामी से गद्दारी में नहीं कर सकता। मैं तो तुम्हें भी यही सलाह दूंगा कि तुम्हें इस चादर का दुरूपयोग नहीं करना चाहिए।"

"अपनी सलाह अपने पास ही रखो। मैं भी कितना मूर्ख हूँ जो इस काम में तुम्हारी सहायता लेने की सोच बैठा," गुस्से में भुनभुनाते हुए गल्लू सियार वहाँ से चला गया पर मल्लू सोच में डूब गया।

"अगर गल्लू जंगल का राजा बन बैठा तब तो अनर्थ हो जाएगा। एक सियार को जंगल का राजा बना देखकर पड़ोसी राजा हम पर आक्रमण कर देगा। शक्तिशाली राजा के अभाव में हम अवश्य ही हार जायेंगे और हमारी स्वतंत्रता खतरे में पड़ जाएगी। यह सोच कर मल्लू सियार सिहर उठा और उसने मन ही मन गल्लू की चाल को असफल बनाने की एक योजना बना डाली।

रात के समय जब सब सो रहे थे तब मल्लू अपने घर से निकला और चुपचाप खिड़की के रास्ते गल्लू के मकान में घुस गया। उसने देखा कि गल्लू की चादर उसके पास रखी हुई है। उसने बड़ी ही सावधानी से उसको उठाया और उसके स्थान पर वैसी ही एक अन्य चादर रख दी जो कि बिल्कुल वैसी थी। इसके बाद वह अपने घर आ गया।

सुबह उठकर नहा-धो कर गल्लू सियार शेर को मारने के लिए चादर ओढ़कर प्रसन्नतापूर्वक उसकी माँद की ओर चल पड़ा। आज उसके पाँव धरती पर नहीं पड़ रहे थे। आखिर वह अपने को भावी राजा समझ रहा था। माँद में पहुँचकर उसने देखा कि शेर अभी सो रहा था। गल्लू ने गर्व से उसको एक लात मारी और उसको जगा कर गालियाँ देने लगा। शेर चौंक कर उठ गया। वह भूखा तो था ही, उपर से गल्लू ने उसको क्रोध भी दिलाया था, सो उसने एक ही बार में गल्लू का काम तमाम कर दिया।

मल्लू सियार को जब अपने भाई की यह खबर मिली तो उसको बड़ा दुख हुआ पर उसने सोचा कि इसके अलावा जंगल की स्वतंत्रता को बचाने का कोई रास्ता भी तो नहीं था। उसकी आँखों में आँसू आ गए, वह उठा और उसने उस जादुई चादर को जला डाला ताकि वह किसी और के हाथ 
में न पड़ जाए।

मल्लू ने अपने भाई की जान देकर अपने राजा के प्राण बचाए थे और जंगल की स्वतंत्रता भी।

गरम जामुन



बहुत समय पहले की बात है, सुंदरवन में श्वेतू नामक एक बूढ़ा खरगोश रहता था। वह इतनी अच्छी कविता लिखता था कि सारे जंगल के पशु्पक्षी उन्हें सुनकर दातों तले उँगली दबा लेते और विद्वान तोता तक उनका लोहा मानता था।

श्वेतू खरगोश ने शास्त्रार्थ में सुरीली कोयल और विद्वान मैना तक को हरा कर विजय प्राप्त की थी। इसी कारण जंगल का राजा शेर भी उसका आदर करता था। पूरे दरबार में उस जैसा विद्वान कोई दूसरा न था। धीरे-धीरे उसे अपनी विद्वत्ता का बड़ा घमण्ड हो गया।

एक दिन वह बड़े सवेरे खाने की तलाश में निकला। बरसात के दिन थे, काले बादलों ने घिरना शुरू ही किया था। मौसम की पहली बरसात होने ही वाली थी। सड़क के किनारे जामुनों के पेड़ काले-काले जामुनों से भरे झुके हुए थे। बड़े-बड़े, काले, रसीले जामुनों को देखकर श्वेतू के मुँह में पानी भर आया।

एक बड़े से जामुन के पेड़ के नीचे जाकर उसने आँखें उठाई और ऊपर देखा तो नन्हें तोतों का एक झुण्ड जामुन खाता दिखाई दिया। बूढ़े खरगोश ने नीचे से आवाज़ दी, "प्यारे नातियों मेरे लिये भी थोड़े से जामुन गिरा दो।"

उन नन्हें तोतों मे मिठ्ठू नाम का एक तोता बड़ा शरारती और चंचल था। वह ऊपर से ही बोला, 'दादा जी, यह तो बताइये कि आम गरम जामुन खायेंगे या ठंडी?"

बेचारा बूढ़ा श्वेतू खरगोश हैरान होकर बोला, "भला जामुन भी कहीं गरम होते हैं? चलो मुझसे मज़ाक न करो। मुझे थोड़े से जामुन तोड़ दो।"

मिठ्ठू बोला, "अरे दादाजी, आप ठहरे इतने बड़े विद्वान। यह भी नहीं जानते कि जामुन गरम भी होते हैं और ठंडे भी। पहले आप बताइये कि आपको कैसे जामुन चाहिये? भला इसे जाने बिना मैं आपको कैसे जामुन दूँगा?"

बूढ़े और विद्वान खरगोश की समझ में बिलकुल भी न आया कि जामुन गरम भला कैसे होंगे? फिर भी वह उस रहस्य को जानना चाहता था इसलिये बोला, "बेटा, तुम मुझे गरम जामुन ही खिलाओ ठंडे तो मैंने बहुत खाए हैं।"

नन्हें मिठ्ठू ने बूढ़े श्वेतू की यह बात सुनकर जामुन की एक डाली को ज़ोर से हिलाया। पके-पके ढेर से जामुन नीचे धूल में बिछ गये। बूढ़ा श्वेतू उन्हें उठाकर धूल फूँक-फूँक कर खाने लगा। यह देखकर नन्हें मिठ्ठू ने पूछा, "क्यों दादाजी, जामुन खूब गरम हैं न?"

"कहाँ बेटा? ये तो साधारण ठंडे जामुन ही हैं।" खरगोश बोला। नन्हें मिठ्ठू तोते ने चौंक कर पूछा, "क्या कहा ठंडे हैं? तो फिर आप इन्हें फूँक-फूँक कर क्यों खा रहे हैं? इस तरह तो सिर्फ गरम चीजें ही खाई जाती है।"

नन्हें मिठ्ठू तोते की बात का रहस्य अब जाकर बूढ़े खरगोश की समझ में आया और वह बड़ा शर्मिन्दा हुआ। इतना विद्वान बूढ़ा श्वेतू खरगोश जरा सी बात में छोटे से तोते के बच्चे से हार गया था। उसका घमण्ड दूर हो गया और उसने एक कविता लिखी -
खूब कड़ा तना शीशम का, बड़े कुल्हाड़े से कट जाता।
लेकिन वो ही बड़ा कुल्हाड़ा, कोमल केले से घिस जाता।
सच है कभी-कभी छोटे भी, ऐसी बड़ी बात कहते हैं।
बहुत बड़े विद्वान गुणी भी, अपना सिर धुनने लगते हैं।

और चाँद फूट गया



आशीष और रोहित के घर आपस में मिले हुए थे। रविवार के दिन वे दोनों बड़े सवेरे उठते ही बगीचे में आ पहुँचे।
" तो आज कौन सा खेल खेलें ?" रोहित ने पूछा। वह छह वर्ष का था और पहली कक्षा में पढ़ता था।
"कैरम से तो मेरा मन भर गया। क्यों न हम क्रिकेट खेलें ?" आशीष ने कहा। वह भी रोहित के साथ पढ़ता था।
"मगर उसके लिये तो ढेर सारे साथियों की ज़रूरत होगी और यहाँ हमारे तुम्हारे सिवा कोई है ही नहीं।" रोहित बोला।

वे कुछ देर तक सोचते रहे फिर आशीष ने कहा, "चलो गप्पें खेलते हैं।"
"गप्पें? भ़ला यह कैसा खेल होता है?" रोहित को कुछ भी समझ में न आया।
"देखो मैं बताता हूँ आ़शीष ने कहा, "हम एक से बढ़ कर एक मज़ेदार गप्प हाँकेंगे। ऐसी गप्पें जो कहीं से भी सच न हों। बड़ा मज़ा आता है इस खेल में। चलो मैं ही शुरू करता हूँ यह जो सामने अशोक का पेड़ है ना रात में बगीचे के तालाब की मछलियाँ इस पर लटक कर झूला झूल रही थीं। रंग बिरंगी मछलियों से यह पेड़ ऐसा जगमगा रहा था मानो लाल परी का राजमहल।"

अच्छा! रोहित ने आश्चर्य से कहा, "और मेरे बगीचे में जो यूकेलिप्टस का पेड़ है ना इ़स पर चाँद सो रहा था। चारों ओर ऐसी प्यारी रोशनी झर रही थी कि तुम्हारे अशोक के पेड़ पर झूला झूलती मछलियों ने गाना गाना शुरू कर दिया।"
"अच्छा! कौन सा गाना?" आशीष ने पूछा। "वही चंदामामा दूर के पुए पकाएँ बूर के।" रोहित ने जवाब दिया।
"अच्छा! फिर क्या हुआ?"
"फिर क्या होता, मछलियाँ इतने ज़ोर से गा रही थीं कि चाँद की नींद टूट गयी और वह धड़ाम से मेरी छत पर गिर गया।"
"फिर?"
"फिर क्या था, वह तो गिरते ही फूट गया।"
"हाय, सच! चाँद फूट गया तो फिर उसके टुकड़े कहाँ गये?" आशीष ने पूछा।
वे तो सब सुबह-सुबह सूरज ने आकर जोड़े और उनपर काले रंग का मलहम लगा दिया। विश्वास न हो तो रात में देख लेना चाँद पर काले धब्बे ज़रूर दिखाई देंगे।"
अच्छा ठीक है मैं रात में देखने की कोशिश करूँगा।" आशीष ने कहा। वह एक नयी गप्प सोच रहा था।
"हाँ याद आया, आशीष बोला, "पिछले साल जब तुम्हारे पापा का ट्रांसफर यहाँ नहीं हुआ था तो एक दिन खूब ज़ोरों की बारिश हुई। इतनी बारिश कि पानी बूँदों की बजाय रस्से की तरह गिर रहा था। पहले तो मैं उसमें नहाया फिर पानी का रस्सा पकड़ कर ऊपर चढ़ गया। पता है वहाँ क्या था?"
"क्या था?" रोहित ने आश्चर्य से पूछा।
"वहाँ धूप खिली हुई थी। धूप में नन्हें नन्हें घर थे, इन्द्रधनुष के बने हुए। एक घर के बगीचे में सूरज आराम से हरी-हरी घास पर लेटा आराम कर रहा था और नन्हंे-नन्हें सितारे धमाचौकड़ी मचा रहे थे "
"सितारे भी कभी धमाचौकड़ी मचा सकते हैं?" रानी दीदी ने टोंक दिया। न जाने वो कब आशीष और रोहित के पास आ खड़ी हुई थीं और उनकी बातें सुन रही थीं।
"अरे दीदी, हम कोई सच बात थोड़ी कह रहे हैं।" रोहित ने सफाई दी।
"अच्छा तो तुम झूठ बोल रहे हो?" रानी ने धमकाया।
"नहीं दीदी, हम तो गप्पें खेल रहे हैं और हम खुशी के लिये खेल रहे हैं, किसी का नुक्सान नहीं कर रहे हैं।" आशीष ने कहा।
"भला ऐसी गप्पें हाँकने से क्या फायदा जिससे किसी का उपकार न हो। मैने एक गप्प हाँकी और दो बच्चों का उपकार भी किया।"
"वो कैसे ?" दोनों बच्चों ने एक साथ पूछा।

अभी अभी तुम दोनों की मम्मियाँ तुम्हें नाश्ते के लिये बुला रही थीं। उन्हें लगा कि तुम लोग बगीचे में खेल रहे होगे लेकिन मैने गप्प मारी कि वे लोग तो मेरे घर में बैठे पढ़ाई कर रहे हैं। उन्होंने मुझसे तुम दोनों को भेजने के लिये कहा हैं।

यह सुनते ही आशीष और रोहित गप्पें भूल कर अपने-अपने घर भागे। उन्हें डर लग रहा था कि मम्मी उनकी पिटाई कर देंगी लेकिन मम्मियों ने तो उन्हें प्यार किया और सुबह-सुबह पढ़ाई करने के लिये शाबशी भी दी। रानी दीदी की गप्प को वे सच मान बैठी थीं।

ईमानदारी की जीत


- जीवन जोशी


चारों ओर सुंदर वन में उदासी छाई हुई थी। वन को अज्ञात बीमारी ने घेर लिया था। वन के लगभग सभी जानवर इस बीमारी के कारण अपने परिवार का कोई न कोई सदस्य गवाँ चुके थे। बीमारी से मुकाबला करने के लिए सुंदर वन के राजा शेर सिंह ने एक बैठक बुलाई।

बैठक का नेतृत्व खुद शेर सिंह ने किया। बैठक में गज्जू हाथी, लंबू जिराफ, अकड़ू सांप, चिंपू बंदर, गिलू गिलहरी, कीनू खरगोश सहित सभी जंगलवासियों ने हिस्सा लिया। जब सभी जानवर इकठ्ठे हो गए, तो शेर सिंह एक ऊँचे पत्थर पर बैठ गया और जंगलवासियों को संबोधित करते हुए कहने लगा, "भाइयो, वन में बीमारी फैलने के कारण हम अपने कई साथियों को गवाँ चुके हैं। इसलिए हमें इस बीमारी से बचने के लिए वन में एक अस्पताल खोलना चाहिए, ताकि जंगल में ही बीमार जानवरों का इलाज किया जा सके।'

इस पर जंगलवासियों ने एतराज जताते हुए पूछा कि अस्पताल के लिए पैसा कहाँ से आएगा और अस्पताल में काम करने के लिए डॉक्टरों की जरूरत भी तो पड़ेगी? इस पर शेर सिंह ने कहा, यह पैसा हम सभी मिलकर इकठ्ठा करेंगे।

यह सुनकर कीनू खरगोश खड़ा हो गया और बोला, "महाराज! मेरे दो मित्र चंपकवन के अस्पताल में डॉक्टर हैं। मैं उन्हें अपने अस्पताल में ले आऊँगा।'

इस फैसले का सभी जंगलवासियों ने समर्थन किया। अगले दिन से ही गज्जू हाथी व लंबू जिराफ ने अस्पताल के लिए पैसा इकठ्ठा करना शुरू कर दिया।

जंगलवासियों की मेहनत रंग लाई और जल्दी ही वन में अस्पताल बन गया। कीनू खरगोश ने अपने दोनों डॉक्टर मित्रों वीनू खरगोश और चीनू खरगोश को अपने अस्पताल में बुला लिया।

राजा शेर सिंह ने तय किया कि अस्पताल का आधा खर्च वे स्वयं वहन करेंगे और आधा जंगलवासियों से इकठ्ठा किया जाएगा।

इस प्रकार वन में अस्पताल चलने लगा। धीरे-धीरे वन में फैली बीमारी पर काबू पा लिया गया। दोनों डॉक्टर अस्पताल में आने वाले मरीजों की पूरी सेवा करते और मरीज़ भी ठीक हो कर डाक्टरों को दुआएँ देते हुए जाते। कुछ समय तक सब कुछ ठीक ठाक चलता रहा। परंतु कुछ समय के बाद चीनू खरगोश के मन में लालच बढ़ने लगा। उसने वीनू खरगोश को अपने पास बुलाया और कहने लगा यदि वे दोनों मिल कर अस्पताल की दवाइयाँ दूसरे वन में बेचें तथा रात में जाकर दूसरे वन के मरीज़ों को देखें तो अच्छी कमाई कर सकते हें और इस बात का किसी को पता भी नहीं लगेगा।

वीनू खरगोश पूरी तरह से ईमानदार था, इसलिए उसे चीनू का प्रस्ताव पसंद नहीं आया और उसने चीनू को भी ऐसा न करने का सुझाव दिया। लेकिन चीनू कब मानने वाला था। उसके ऊपर तो लालच का भूत सवार था। उसने वीनू के सामने तो ईमानदारी से काम करने का नाटक किया। परंतु चोरी-छिपे बेइमानी पर उतर आया। वह जंगलवासियों की मेहनत से खरीदी गई दवाइयों को दूसरे जंगल में ले जाकर बेचने लगा तथा शाम को वहाँ के मरीजों का इलाज करके कमाई करने लगा।

धीरे-धीरे उसका लालच बढ़ता गया। अब वह अस्पताल के कम, दूसरे वन के मरीजों को ज्यादा देखता। इसके विपरीत, डॉक्टर वीनू अधिक ईमानदारी से काम करता। मरीज भी चीनू की अपेक्षा डॉक्टर वीनू के पास जाना अधिक पसंद करते। एक दिन सभी जानवर मिलकर राजा शेर सिंह के पास चीनू की शिकायत लेकर पहुँचे। उन्होंने चीनू खरगोश की कारगुजारियों से राजा को अवगत कराया और उसे दंड देने की माँग की। शेर सिंह ने उनकी बात ध्यान से सुनी और कहा कि सच्चाई अपनी आँखों से देखे बिना वे कोई निर्णय नहीं लेंगे। इसलिए वे पहले चीनू डॉक्टर की जांच कराएँगे, फिर अपना निर्णय देंगे। जांच का काम चालाक लोमड़ी को सौंपा गया, क्योंकि चीनू खरगोश लोमड़ी को नहीं जानता था।

लोमड़ी अगले ही दिन से चीनू के ऊपर नजर रखने लगी। कुछ दिन उस पर नज़र रखने के बाद लोमड़ी ने उसे रंगे हाथों पकड़ने की योजना बनाई। उसने इस योजना की सूचना शेर सिंह को भी दी, ताकि वे समय पर पहुँच कर सच्चाई अपनी आँखों से देख सकें। लोमड़ी डॉक्टर चीनू के कमरे में गई और कहा कि वह पास के जंगल से आई है। वहाँ के राजा काफी बीमार हैं, यदि वे तुम्हारी दवाई से ठीक हो गए, तो तुम्हें मालामाल कर देंगे। यह सुनकर चीनू को लालच आ गया। उसने अपना सारा सामान समेटा और लोमड़ी के साथ दूसरे वन के राजा को देखने के लिए चल पड़ा। शेर सिंह जो पास ही छिपकर सारी बातें सुन रहा था, दौड़कर दूसरे जंगल में घुस गया और निर्धारित स्थान पर जाकर लेट गया।

थोड़ी देर बाद लोमड़ी डॉक्टर चीनू को लेकर वहाँ पहुँची, जहाँ शेर सिंह मुँह ढँककर सो रहा था। जैसे ही चीनू ने राजा के मुँह से हाथ हटाया, वह शेर सिंह को वहाँ पाकर सकपका गया और डर से काँपने लगा। उसके हाथ से सारा सामान छूट गया, क्योंकि उसकी बेइमानी का सारा भेद खुल चुका था। तब तक सभी जानवर वहाँ आ गए थे। चीनू खरगोश हाथ जोड़कर अपनी कारगुजारियों की माफी माँगने लगा।

राजा शेर सिंह ने आदेश दिया कि चीनू की बेइमानी से कमाई हुई सारी संपत्ति अस्पताल में मिला ली जाए और उसे धक्के मारकर जंगल से बाहर निकाल दिया जाए। शेर सिंह के आदेशानुसार चीनू खरगोश को धक्के मारकर जंगल से बाहर निकाल दिया गया। इस कार्रवाई को देखकर जंगलवासियों ने जान लिया कि ईमानदारी की हमेशा जीत होती है।

ईमानदारी



कहानी - चित्रा रामास्वामी


विक्की अपने स्कूल में होने वाले स्वतंत्रता दिवस समारोह को ले कर बहुत उत्साहित था। वह भी परेड़ में हिस्सा ले रहा था।

दूसरे दिन वह एकदम सुबह जग गया लेकिन घर में अजीब सी शांति थी। वह दादी के कमरे में गया, लेकिन वह दिखाई नहीं पड़ी।
"माँ, दादीजी कहाँ हैं?" उसने पूछा।
"रात को वह बहुत बीमार हो गई थीं। तुम्हारे पिताजी उन्हें अस्पताल ले गए थे, वह अभी वहीं हैं उनकी हालत काफी खराब है।

विक्की एकाएक उदास हो गया।

उसकी माँ ने पूछा, "क्या तुम मेरे साथ दादी जी को देखने चलोगे? चार बजे मैं अस्पताल जा रही हूँ।"

विक्की अपनी दादी को बहुत प्यार करता था। उसने तुरंत कहा, "हाँ, मैं आप के साथ चलूँगा।" वह स्कूल और स्वतंत्रता दिवस के समारोह के बारे में सब कुछ भूल गया।

स्कूल में स्वतंत्रता दिवस समारोह बहुत अच्छी तरह संपन्न हो गया। लेकिन प्राचार्य खुश नहीं थे। उन्होंने ध्यान दिया कि बहुत से छात्र आज अनुपस्थित हैं।

उन्होंने दूसरे दिन सभी अध्यापकों को बुलाया और कहा, "मुझे उन विद्यार्थियों के नामों की सूची चाहिए जो समारोह के दिन अनुपस्थित थे।"

आधे घंटे के अंदर सभी कक्षाओं के विद्यार्थियों की सूची उन की मेज पर थी। कक्षा छे की सूची बहुत लंबी थी। अत: वह पहले उसी तरफ मुड़े।

जैसे ही उन्होंने कक्षा छे में कदम रखे, वहाँ चुप्पी सी छा गई। उन्होंने कठोरतापूर्वक कहा, "मैंने परसों क्या कहा था?"
"यही कि हम सब को स्वतंत्रता दिवस समारोह में उपस्थित होना चाहिए," गोलमटोल उषा ने जवाब दिया।
"तब बहुत सारे बच्चे अनुपस्थित क्यों थे?" उन्होंने नामों की सूची हवा में हिलाते हुए पूछा।

फिर उन्होंने अनुपस्थित हुए विद्यार्थियों के नाम पुकारे, उन्हें डाँटा और अपने डंडे से उनकी हथेलियों पर मार लगाई।
"अगर तुम लोग राष्ट्रीय समारोह के प्रति इतने लापरवाह हो तो इसका मतलब यही है कि तुम लोगों को अपनी मातृभूमि से प्यार नहीं है। अगली बार अगर ऐसा हुआ तो मैं तुम सबके नाम स्कूल के रजिस्टर से काट दूँगा।"

इतना कह कर वह जाने के लिए मुड़े तभी विक्की आ कर उन के सामने खड़ा हो गया।

"क्या बात है?"
"महोदय, विक्की भयभीत पर दृढ़ था, मैं भी स्वतंत्रता दिवस समारोह में अनुपस्थित था, पर आप ने मेरा नाम नहीं पुकारा।" कहते हुए विक्की ने अपनी हथेलियाँ प्राचार्य महोदय के सामने फैला दी।

सारी कक्षा साँस रोक कर उसे देख रही थी।

प्राचार्य कई क्षणों तक उसे देखते रहे। उनका कठोर चेहरा नर्म हो गया और उन के स्वर में क्रोध गायब हो गया।
"तुम सजा के हकदार नहीं हो, क्योंकि तुम में सच्चाई कहने की हिम्मत है। मैं तुम से कारण नहीं पूछूँगा, लेकिन तुम्हें वचन देना होगा कि अगली बार राष्ट्रीय समारोह को नहीं भूलोगे। अब तुम अपनी सीट पर जाओ।

विक्की ने जो कुछ किया, इसकी उसे बहुत खुशी थी।

अनोखी तरकीब

अनोखी तरकीब-  पराग ज्ञानदेव चौधरी

बहुत पुरानी बात है। एक अमीर व्यापारी के यहाँ चोरी हो गयी। बहुत तलाश करने के बावजूद सामान न मिला और न ही चोर का पता चला। तब अमीर व्यापारी शहर के काजी के पास पहुँचा और चोरी के बारे में बताया।
सबकुछ सुनने के बाद काजी ने व्यापारी के सारे नौकरों और मित्रों को बुलाया। जब सब सामने पहुँच गए तो काजी ने सब को एक-एक छड़ी दी। सभी छड़ियाँ बराबर थीं। न कोई छोटी न बड़ी।

सब को छड़ी देने के बाद काजी बोला, "इन छड़ियों को आप सब अपने अपने घर ले जाएँ और कल सुबह वापस ले आएँ। इन सभी छड़ियों की खासियत यह है कि यह चोर के पास जा कर ये एक उँगली के बराबर अपने आप बढ़ जाती हैं। जो चोर नहीं होता, उस की छड़ी ऐसी की ऐसी रहती है। न बढ़ती है, न घटती है। इस तरह मैं चोर और बेगुनाह की पहचान कर लेता हूँ।"

काजी की बात सुन कर सभी अपनी अपनी छड़ी ले कर अपने अपने घर चल दिए।

उन्हीं में व्यापारी के यहाँ चोरी करने वाला चोर भी था। जब वह अपने घर पहुँचा तो उस ने सोचा, "अगर कल सुबह काजी के सामने मेरी छड़ी एक उँगली बड़ी निकली तो वह मुझे तुरंत पकड़ लेंगे। फिर न जाने वह सब के सामने कैसी सजा दें। इसलिए क्यों न इस विचित्र छड़ी को एक उँगली काट दिया जााए। ताकि काजी को कुछ भी पता नहीं चले।'

चोर यह सोच बहुत खुश हुआ और फिर उस ने तुरंत छड़ी को एक उँगली के बराबर काट दिया। फिर उसे घिसघिस कर ऐसा कर दिया कि पता ही न चले कि वह काटी गई है।

अपनी इस चालाकी पर चोर बहुत खुश था और खुशीखुशी चादर तान कर सो गया। सुबह चोर अपनी छड़ी ले कर खुशी खुशी काजी के यहाँ पहुँचा। वहाँ पहले से काफी लोग जमा थे।
काजी १-१ कर छड़ी देखने लगे। जब चोर की छड़ी देखी तो वह १ उँगली छोटी पाई गई। उस ने तुरंत चोर को पकड़ लिया। और फिर उस से व्यापारी का सारा माल निकलवा लिया। चोर को जेल में डाल दिया गया।

सभी काजी की इस अनोखी तरकीब की प्रशंसा कर रहे थे।